कान्तिलाल क्यों डरा वास्तु से vastu phobia



कान्तिलाल क्यों डरा वास्तु से vastu phobia

हमारे पास में कांतीलाल नाम का व्यक्ति रहता था। वह बहुत ही खुश मिजाज व्यक्ति रहता था। उसके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी। घर में तीन कारें थी। तथा घर भी बहुत शानदार बना रखा था। उसका पूरा परिवार बहुत ख़ुशी से रहता था।

कान्तिलाल का एक बहुत ही शानदार होटल था। जिसमे चालीस कमरे थे। शहर में कोई भी आता तो उसके होटल में ही रुकता था। सभी लोग उसके होटल एवं खाने की बहुत तारीफ़ करते थे। कान्तिलाल के होटल का कामकाज बहुत अच्छा चल रहा था। पच्चीस साल से उनका होटल शहर का नंबर वन होटल था। 

परन्तु अब शहर में नए-नए होटल बनने लगे थे। नए होटल आधुनिक सुविधाओं से युक्त थे। इसके विपरीत कान्तिलाल का होटल अभी भी पुराने समय के अनुसार ही बना हुआ था। कान्तिलाल ने अपने होटल को आधुनिक सुविधाओं से दूर ही रखा।

अब कान्तिलाल के होटल में दिन प्रतिदिन ग्राहकों की संख्या कम होती गई। लोग दूसरे आधुनिक होटलों को पसंद करने लगे। क्योंकि ग्राहक को जहाँ अच्छी सुविधा मिलेगी वहीं पर जायेगा। उसे कान्तिलाल से क्या लेना देना।

अब कान्तिलाल उदास रहने लगा उसके होटल के चालीस में से कभी एक तो कभी दो कमरे ही भरे रहते बाकी सब खाली रहने लगे। कान्तिलाल को नौकरों की पगार भी जेब से देना पड़ रही थी। अब तो होटल ही बंद करने की नौबत आ गयी। धीरे-धीरे कान्तिलाल कर्ज में डूबने लगा।

एक दिन एक वास्तु शास्त्री राय साहब कान्तिलाल के होटल में रुके। जब राय साहब ने कान्तिलाल की कहानी सुनी तब उन्होंने कुछ उपाय सुझाये। होटल का किचन गलत है, लेटबाथ गलत जगह बने है, सीढ़ियां उल्टी घूमी हुई है। पानी की टंकी गलत दिशा में है, प्रवेश द्वार दूसरी जगह होना चाहिए आदि और भी बहुत कुछ।

कान्तिलाल अब होटल में तोड़फोड़ करवाने का मन बना चुका था। जिसमे लगभग दस से पंद्रह हजार का खर्च होने वाले थे। अब कान्तिलाल की चिंता और अधिक बढ़ गयी। इतने पैसों का इंतजाम कैसे किया जाए।

कान्तिलाल को परेशान देखकर वास्तु शास्त्री  राय साहब ने कान्तिलाल से उसके घर का वास्तु देखने की बात की। कान्तिलाल राय साहब को घर को दिखने लेकर गए। घर में घुसते ही राय साहब ने जेब से दिशासूचक यन्त्र निकाला और चहरे पर बहुत गंभीर मुद्रा लाते हुए घर की कमियाँ गिनाना शुरू कर दी।

राय साहब ने घर का वास्तु ठीक नहीं कराया तो घर के सदस्यों की मृत्यु तक का भय दिखा दिया। अब तो कान्तिलाल को पसीने-पसीने छूट गए। डर के मारे उसका चेहरा पीला पड़ने लगा। कान्तिलाल राय साहब के पैरो में गिर पड़ा, और उनसे इस संकट से मुक्त करवाने की गुहार करने लगा।

दो दिन बाद कान्तिलाल का बड़ा बेटा एकलव्य अपने पिताजी का हाल जानने के लिए घर पर आया, तब उसे राय साहब वाली बात पता चली। एकलव्य शहर में रहकर पढ़ाई करता था। एकलव्य एक बहुत ही समझदार लड़का था। वह पढाई के बाद शहर के एक होटल में नौकरी करने लगा था।

एकलव्य ने अपने पिताजी को समझाया कि, जिस होटल और घर में हमने पच्चीस साल बहुत ख़ुशी से बिताए। कभी कोई दुर्घटना नहीं हुई, आज उसमे अचानक वास्तु कहाँ से पैदा हो गया। एकलव्य ने कहा की हम समय के अनुसार हमारे होटल में सभी सुविधाएं नहीं दे रहे है, इसलिए हमारे होटल में ग्राहकों का आना कम हो गया है। अब एकलव्य के पिताजी के मन में वास्तु का डर थोड़ा कम होने लगा।

एकलव्य ने पिताजी से कहा कि, अब हम हमारे होटल को शहर के अनुरूप सर्वसुविधा युक्त बनाएंगे। उसकी तोड़फोड़ करने की जगह पैसा उसके आधुनिक बनाने में खर्च करेंगे। बेटे ने लोन लेकर एक साल में ही होटल को सर्वसुविधा युक्त एवं आधुनिक कर दिया गया।

अब धीरे-धीरे कान्तिलाल का होटल फिर से अच्छा चलने लगा। एकलव्य ने होटल का काम अच्छे से संभाल लिया था। होटल शहर का सबसे बढ़िया होटल बन चुका था। कान्तिलाल पहले से भी अधिक संपन्न हो गया था। एवं उसका पूरा परिवार बहुत ही खुशी से रहने लगे।

कान्तिलाल को डर क्यों लगा एवं क्या कान्तिलाल को राय साहब की बात मानना चाहिए थी। कृपया कमेंट करके जरूर बताये।

Post a Comment

0 Comments